करम पर्व प्रकृति, संस्कृति और सामुदायिक जीवन-दर्शन से जुड़ने का अवसर : शिल्पी नेहा तिर्की

रांची। राजधानी रांची सहित पूरे झारखंड में करमा पर्व की धूम है। गांवों से लेकर शहरों तक अखड़ों में करम गीतों की गूंज और मांदर की थाप सुनाई दे रही है। लोग पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करमा पर्व मना रहे हैं। इसी क्रम में रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के अखड़ा में मंगलवार को करम महोत्सव आयोजित किया गया। इसमें कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं।

महोत्सव को संबोधित करते हुए मंत्री शल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि करम केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा, संस्कृति और सामुदायिक जीवन-दर्शन को समझने का अवसर है। यह पर्व अपनी जड़ों से जुड़ने, समृद्ध विरासत को समझने और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से अपने पारंपरिक ज्ञान, जीवन-पद्धति और संस्कृति का वाहक रहा है। जल, जंगल और जमीन के साथ संतुलित जीवन जीने तथा प्रकृति के संरक्षण की उसकी परंपरा में ऐसा समृद्ध ज्ञान और अनुभव है, जिससे आधुनिक समाज भी बहुत कुछ सीख सकता है।

शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज को केवल लाभार्थी के रूप में देखने के बजाय उसके ज्ञान, अनुभव, परंपराओं और जीवन-दृष्टि को समझने तथा उससे संवाद करने की जरूरत है। विकास की प्रक्रिया में आदिवासी समाज की भागीदारी केवल योजनाओं के लाभ तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी उचित सम्मान और स्थान मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज भारत की प्राचीन सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके इतिहास, पहचान और योगदान को स्वीकार करना किसी दूसरे समाज के अधिकारों को कम करना नहीं, बल्कि भारत के इतिहास, संस्कृति और विविधता को व्यापक रूप से स्वीकार करना है।

मंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज के संरक्षण की चर्चा केवल संवैधानिक अधिकारों और संरक्षण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वास्तविक सांस्कृतिक संरक्षण तभी संभव है, जब आदिवासी भाषाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों, पारंपरिक ज्ञान और अखड़ा जैसी सामुदायिक संस्थाओं एवं परंपराओं को भी संरक्षित और मजबूत किया जाए।

उन्होंने कहा कि भाषा, गीत, नृत्य और अखड़ा केवल संस्कृति के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से संजोए गए ज्ञान, स्मृति, संवाद और सामुदायिक पहचान के जीवंत माध्यम हैं। अखड़ा सामाजिक संवाद, सामुदायिक एकजुटता और सांस्कृतिक हस्तांतरण की महत्वपूर्ण कड़ी रहा है। इसलिए इन्हें मजबूत करना सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।

करम पर्व की प्रासंगिकता बताते हुए मंत्री ने कहा कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सीख कोई नई अवधारणा नहीं है। आदिवासी समाज ने पीढ़ियों से जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की परंपरा को आगे बढ़ाया है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब आदिवासी समाज का पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ सामंजस्य की जीवन-दृष्टि और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

उन्होंने कहा कि करम पर्व अपनी जड़ों, भाषा, संस्कृति और सामुदायिक पहचान से जुड़ने का अवसर देता है। इस समृद्ध विरासत को केवल उत्सवों तक सीमित रखने के बजाय नई पीढ़ी को इसके ज्ञान, मूल्यों और जीवन-दृष्टि से जोड़ना जरूरी है।

मंत्री ने कहा कि करम पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान, समुदाय के प्रति जिम्मेदारी और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सजग रहने का संदेश देता है। यह पर्व अपनी जड़ों को याद करने, भाषा और संस्कृति को सहेजने तथा इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की प्रेरणा देता है।

कार्यक्रम में रांची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सरोज शर्मा, झारखंड ओपन यूनिवर्सिटी के कुलपति सहित कई शिक्षाविद और विभाग से जुड़े लोग उपस्थित रहे। अतिथियों ने करमा पर्व की सांस्कृतिक परंपरा और इसके महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और लोक परंपराओं से जोड़ने का संदेश दिया गया।

Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram
Picture of अंग भारत • रिपोर्टर

अंग भारत • रिपोर्टर

‘अंग भारत’ एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र है, जो मिलन ग्रुप द्वारा संचालित एक बहुआयामी मीडिया संगठन का हिस्सा है। हमारा कॉर्पोरेट कार्यालय बिहार के ऐतिहासिक अंग प्रदेश के पवित्र स्थान बांका में स्थित है। हमारा उद्देश्य निष्पक्ष, विश्वसनीय और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुंचाना है।”

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Posts