वडनगर से वैश्विक मंच तक : नरेंद्र मोदी की 75 वर्षों की संघर्षपूर्ण जीवन-यात्रा

किसी व्यक्ति का 75 वर्ष का जीवन केवल उम्र का पड़ाव नहीं, बल्कि अनुभवों, संघर्षों, फैसलों, सफलताओं और चुनौतियों से बनी लंबी यात्रा होता है। जब यह यात्रा सार्वजनिक जीवन से जुड़ती है तो उसका दायरा और व्यापक हो जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जीवन भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी ने साधारण पारिवारिक परिवेश से निकलकर देश के प्रधानमंत्री पद तक का सफर तय किया। उनकी जीवन-यात्रा संगठनात्मक राजनीति से होते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंची। लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के बाद वे 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बने। 2019 में दूसरी और 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर उन्होंने भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण दौर में अपनी भूमिका स्थापित की।

उनके सार्वजनिक जीवन को पिछले वर्षों में बदलते भारत की तस्वीर से भी जोड़कर देखा जाता है। सड़क, रेल और हवाई संपर्क के विस्तार के साथ डिजिटल तकनीक, डिजिटल भुगतान, स्वास्थ्य सुरक्षा, आवास, स्वच्छता, पेयजल, महिला स्वयं सहायता समूह और किसानों से जुड़ी योजनाओं ने शासन और आम नागरिक के बीच संबंध को नया रूप दिया है। 75 वर्ष की उम्र में उनकी यात्रा को समझना केवल उपलब्धियों की सूची देखना नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि सरकार ने किन समस्याओं को प्राथमिकता दी, उनके समाधान के लिए कौन-से रास्ते अपनाए, योजनाओं की पहुंच कितनी बढ़ी और किन क्षेत्रों में चुनौतियां बनी हुई हैं। यही दृष्टि उनके सार्वजनिक जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने का आधार देती है।

वडनगर से शुरू हुई कहानी

हर बड़ी राजनीतिक यात्रा की अपनी एक शुरुआत होती है और नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक जीवन की कहानी गुजरात के छोटे से शहर वडनगर से शुरू होती है। एक साधारण परिवार में जन्म और सीमित संसाधनों के बीच बीता बचपन उनके व्यक्तित्व के निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बना। उनके शुरुआती जीवन के उल्लेखों में परिवार की सीमित आर्थिक परिस्थितियों के बीच पढ़ाई जारी रखने, पारिवारिक जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने और पुस्तकों के प्रति उनकी गहरी रुचि की चर्चा मिलती है। किसी भी व्यक्तित्व के निर्माण में बचपन के अनुभवों की गहरी भूमिका होती है। संघर्ष केवल कठिन परिस्थितियों का सामना करना नहीं सिखाता, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों के जीवन और उनकी चुनौतियों को करीब से समझने का अवसर भी देता है। नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन को देखें तो उनकी साधारण पृष्ठभूमि, संगठनात्मक अनुशासन और निरंतर सक्रिय रहने की प्रवृत्ति उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण विशेषताओं के रूप में सामने आती है।

युवावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव ने उनके संगठनात्मक जीवन को दिशा दी। संघ के साथ काम करते हुए उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों के बीच रहने, सामाजिक गतिविधियों को समझने और संगठन के स्तर पर जिम्मेदारियां निभाने का अनुभव मिला। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के संगठन में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने चुनावी राजनीति, जनसंपर्क और संगठन संचालन की बारीकियों को समझा। लंबे समय तक संगठन में काम करने का यही अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की आधारभूमि बना और उन्हें राज्य के प्रशासन से लेकर राष्ट्रीय नेतृत्व तक की भूमिका निभाने के लिए तैयार करता गया।

गुजरात से राष्ट्रीय राजनीति तक

2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने और मई 2014 तक इस पद पर बने रहे। उनके कार्यकाल में गुजरात के विकास, उद्योग, निवेश, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक मॉडल पर व्यापक चर्चा हुई। समर्थकों ने इसे विकास और प्रशासन में तेजी का दौर बताया। 2014 में उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव में बहुमत हासिल किया और वे देश के प्रधानमंत्री बने। 2019 में पार्टी ने फिर बहुमत प्राप्त किया, जबकि 2024 में मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। उनके शासन का मूल्यांकन चुनावी सफलता के साथ नीतियों और नागरिक जीवन पर प्रभाव के आधार पर भी किया जाना चाहिए।

शासन की नई भाषा : योजना से सीधे लाभ तक

प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल की एक प्रमुख विशेषता सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचाने पर जोर रहा है। जन धन खाते, आधार और मोबाइल के संयोजन से सरकारी सहायता को लाभार्थियों के बैंक खातों तक सीधे पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत हुई, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम करने और पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास किया गया। प्रधानमंत्री जन धन योजना ने बैंकिंग व्यवस्था से बाहर रहे लोगों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ा। बीमा और पेंशन योजनाओं के विस्तार से सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की कोशिश हुई। बैंक खाते सरकारी सहायता, बीमा, पेंशन और डिजिटल लेन-देन के माध्यम बने। आगे चलकर मोबाइल, बैंकिंग और डिजिटल तकनीक का मेल रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा बना और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने शासन की पहुंच नागरिकों तक और व्यापक की।

गरीब कल्याण : सहायता से सुविधा तक

गरीबी केवल आय की कमी नहीं, बल्कि आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, बिजली, पानी और सामाजिक सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से भी जुड़ी है। इसी दृष्टि से गरीब कल्याण की नीतियों में कई क्षेत्रों को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया। नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी से संबंधित रिपोर्टों में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसे विभिन्न आयामों के आधार पर गरीबी का आकलन किया गया है। आधिकारिक आंकड़ों में 2005-06 के बाद बहुआयामी गरीबी में गिरावट दर्ज किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, इन आंकड़ों को समझते समय सर्वेक्षण अवधि, पद्धति और संकेतकों के संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत ने क्रमशः आवास, स्वच्छ ईंधन और स्वास्थ्य सुरक्षा जैसी जरूरतों को केंद्र में रखा। पक्का मकान परिवार को सुरक्षा और सम्मान देता है, गैस कनेक्शन महिलाओं के स्वास्थ्य व श्रम से जुड़ा है, जबकि स्वास्थ्य सुरक्षा गंभीर बीमारी के समय आर्थिक बोझ कम करने में सहायक हो सकती है। इस तरह कल्याणकारी योजनाओं का असर सरकारी सहायता से आगे बढ़कर परिवारों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ता है।

किसान और गांव : भारत की जड़ों से जुड़ी प्राथमिकता

भारत की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना में कृषि की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों तक प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता पहुंचाने का प्रयास किया गया। जून 2024 में नरेंद्र मोदी ने पीएम-किसान की 17वीं किस्त जारी करने संबंधी फाइल पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद वाराणसी में लगभग 9.26 करोड़ किसानों को 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के जरिए दी गई। कृषि नीति में मृदा स्वास्थ्य कार्ड, ई-नाम, सिंचाई, कृषि अवसंरचना और ग्रामीण भंडारण जैसे क्षेत्रों पर भी जोर रहा। खेती को मजबूत बनाने के लिए उत्पादन से लेकर भंडारण, परिवहन और बाजार तक पूरी श्रृंखला को बेहतर करना जरूरी है। ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए 2024 में वाराणसी कार्यक्रम में 30 हजार से अधिक स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को ‘कृषि सखी’ के रूप में प्रमाणित किया गया।

स्वच्छता और जीवन की गरिमा

स्वच्छ भारत मिशन ने स्वच्छता को सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ाकर जनभागीदारी का अभियान बनाया। शौचालय निर्माण, खुले में शौच और स्वच्छता व्यवहार जैसे विषय व्यापक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने। स्वच्छता का सीधा संबंध स्वास्थ्य, सम्मान और नागरिक जीवन की गुणवत्ता से है। गांवों में शौचालय निर्माण से लेकर शहरों में कचरा प्रबंधन तक, इसका उद्देश्य स्वच्छता के साथ सामाजिक व्यवहार में बदलाव लाना रहा। इसी क्रम में जल जीवन मिशन ने ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा। पेयजल की उपलब्धता विशेष रूप से महिलाओं के समय, श्रम और स्वास्थ्य से जुड़ी है। इसलिए स्वच्छता, पेयजल और महिला सशक्तिकरण को एक-दूसरे से जुड़े विषयों के रूप में देखना जरूरी है।

स्वास्थ्य : सुरक्षा का नया आधार

आयुष्मान भारत ने गरीब और कमजोर परिवारों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का व्यापक ढांचा तैयार करने का प्रयास किया। गंभीर बीमारी का खर्च परिवारों को दोबारा गरीबी में धकेल सकता है, इसलिए आर्थिक सुरक्षा सामाजिक कल्याण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कोविड-19 महामारी ने स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौतियों और क्षमताओं को सामने रखा। इस दौरान टीकाकरण, स्वास्थ्य अवसंरचना और डिजिटल माध्यमों का बड़े पैमाने पर उपयोग हुआ। महामारी ने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, तकनीक और प्रशासन से भी जुड़ा है।

सड़क से डिजिटल हाईवे तक

किसी देश का विकास उसकी सड़कों, रेल, बंदरगाहों और डिजिटल नेटवर्क से भी दिखाई देता है। मोदी सरकार के वर्षों में बुनियादी ढांचे और डिजिटल कनेक्टिविटी पर जोर रहा। राजमार्गों के विस्तार, रेलवे आधुनिकीकरण, क्षेत्रीय हवाई संपर्क और जलमार्ग विकास के साथ डिजिटल नेटवर्क भी बढ़ा। ‘उड़ान’ जैसी योजनाओं ने छोटे शहरों को हवाई संपर्क से जोड़ने का प्रयास किया, जबकि डिजिटल भुगतान ने आर्थिक लेन-देन की शैली बदली। इस डिजिटल परिवर्तन ने तकनीक को बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय आम नागरिक की रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ने का रास्ता खोला।

अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता

‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘स्टार्टअप इंडिया’ और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं ने विनिर्माण, निवेश और उद्यमिता को राष्ट्रीय नीति के केंद्र में रखा। जीएसटी ने विभिन्न राज्यों की कर व्यवस्थाओं को एक व्यापक अप्रत्यक्ष कर ढांचे में जोड़ने का प्रयास किया। आर्थिक विकास के साथ रोजगार, कौशल, छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धा और समान अवसर जैसी चुनौतियां भी बनी हुई हैं। इसलिए आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि रोजगार और उद्यम के अवसर पैदा करना भी है। अर्थव्यवस्था के विस्तार और वैश्विक भूमिका बढ़ने के साथ रोजगार की गुणवत्ता, क्षेत्रीय संतुलन, मानव पूंजी और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण है।

महिला शक्ति : कल्याण से नेतृत्व तक

महिला सशक्तिकरण अब शिक्षा और स्वास्थ्य से आगे बढ़कर आर्थिक भागीदारी, उद्यमिता और नेतृत्व से जुड़ रहा है। उज्ज्वला योजना, स्वयं सहायता समूह, ‘लखपति दीदी’ और ‘कृषि सखी’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं की आर्थिक भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया गया। स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर महिलाएं बैंकिंग, छोटे व्यवसाय और कृषि गतिविधियों में भागीदारी कर रही हैं। इसका प्रभाव परिवार से आगे गांव की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। वास्तविक सशक्तिकरण तभी माना जाएगा, जब महिलाएं लाभार्थी से आगे बढ़कर आर्थिक और सामाजिक निर्णयों में प्रभावी भागीदारी निभाएं।

युवा, शिक्षा और तकनीक

भारत की युवा आबादी उसकी बड़ी ताकत है। इसलिए शिक्षा, कौशल विकास, स्टार्टअप, नवाचार और तकनीकी प्रशिक्षण भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। नई शिक्षा नीति और उद्यमिता को बढ़ावा इसी दिशा में प्रयास हैं। आज का युवा केवल नौकरी पाने वाला नहीं, बल्कि व्यवसाय, तकनीक और नवाचार के जरिए वैश्विक बाजार में योगदान दे सकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, अंतरिक्ष विज्ञान और डिजिटल तकनीक में अवसर बढ़ रहे हैं। हालांकि, बड़ी युवा आबादी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पर्याप्त रोजगार सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण चुनौती बनी रहेगी।

संस्कृति और सभ्यता का वैश्विक संवाद

नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में भारतीय संस्कृति, योग और विरासत का विषय प्रमुखता से दिखाई देता है। भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया और 177 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अर्थ केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि योग, आयुर्वेद, भारतीय भाषाओं, कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तथा दुनिया से जोड़ना भी है। ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ जैसी अवधारणाएं विविधता में एकता को रेखांकित करती हैं। इसकी सार्थकता तभी है, जब देश की भाषाओं, लोक परंपराओं और क्षेत्रीय संस्कृतियों को समान सम्मान मिले।

पर्यावरण और जलवायु न्याय

विकास और पर्यावरण को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी रूप में देखा जाता है, लेकिन भविष्य के भारत के लिए दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, नवीकरणीय ऊर्जा, मिशन लाइफ और जलवायु न्याय ने भारत के पर्यावरणीय दृष्टिकोण को वैश्विक पहचान दी। नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान जलवायु परिवर्तन से संबंधित अलग विभाग बनाए जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसी पहल ने भारत की जलवायु कूटनीति को नया मंच दिया। भारत के सामने चुनौती विकास की गति बनाए रखते हुए उत्सर्जन कम करने और पर्यावरण संरक्षण की है। इसके लिए हरित तकनीक और स्वच्छ ऊर्जा का महत्व लगातार बढ़ेगा।

विदेश नीति : भारत की बढ़ती वैश्विक सक्रियता

नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में विदेश नीति सक्रिय कूटनीति और उच्च स्तरीय संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। पड़ोसी देशों के साथ-साथ अमेरिका, रूस, यूरोप, खाड़ी, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के साथ भारत ने विभिन्न मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत करने का प्रयास किया। जी-20 की भारत की अध्यक्षता ने वैश्विक आर्थिक विमर्श में देश की सक्रियता बढ़ाई और ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रमुखता देने का अवसर दिया। बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना के बीच रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, चीन के साथ संबंध, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन भारत के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं, जिनके लिए संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति आवश्यक है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता

राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में रक्षा उत्पादन, सीमा अवसंरचना, आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर दिया गया। भारत की सुरक्षा अब केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। साइबर सुरक्षा, ड्रोन, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और समुद्री सुरक्षा भी इसका हिस्सा बन चुके हैं। रक्षा क्षेत्र में घरेलू उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य आर्थिक और सामरिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यदि देश अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए तकनीक और उपकरणों का बड़ा हिस्सा स्वयं तैयार करता है, तो इससे रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ सकती है।

प्रशासन में तकनीक और जवाबदेही

PRAGATI जैसे मंचों के माध्यम से परियोजनाओं की निगरानी और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को बढ़ाने का प्रयास किया गया। प्रशासन में तकनीक का इस्तेमाल केवल फाइलों को डिजिटल बनाने तक सीमित नहीं रहा; इसका उद्देश्य निर्णय प्रक्रिया और परियोजनाओं की निगरानी को भी अधिक सक्रिय बनाना रहा। ई-गवर्नेंस का सबसे बड़ा लाभ तभी है जब वह नागरिक के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर कम करे। डिजिटल प्रमाणपत्र, ऑनलाइन सेवाएं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और डिजिटल भुगतान इसी दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव हैं।

संवाद की बदलती शैली

नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन की एक अलग पहचान उनकी संवाद शैली भी रही है। ‘मन की बात’, सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों के जरिए सीधे नागरिकों से संवाद की परंपरा ने राजनीतिक संचार का स्वरूप बदला। सोशल मीडिया के दौर में नेता और जनता के बीच दूरी कम हुई है, लेकिन इसके साथ सूचना की विश्वसनीयता और जिम्मेदार संवाद की चुनौती भी बढ़ी है। लोकतंत्र में संवाद तभी मजबूत होता है जब उसमें उपलब्धियों के साथ प्रश्न पूछने और असहमति व्यक्त करने की जगह भी बनी रहे।

75 वर्ष : उपलब्धियों के साथ चुनौतियों को देखने का समय

75 वर्ष की उम्र किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व की यात्रा को पीछे मुड़कर देखने का अवसर देती है। नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में संगठनात्मक अनुशासन, राजनीतिक सफलता, प्रशासनिक प्रयोग, कल्याणकारी योजनाएं, तकनीकी बदलाव और वैश्विक कूटनीति के कई अध्याय हैं। वहीं रोजगार की गुणवत्ता, किसानों की आय, शिक्षा-स्वास्थ्य, सामाजिक असमानता, क्षेत्रीय संतुलन, छोटे कारोबार और संस्थागत जवाबदेही जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। किसी योजना के आंकड़े उसकी पहुंच बताते हैं, लेकिन वास्तविक प्रभाव समझने के लिए लाभार्थियों के अनुभव, स्वतंत्र अध्ययन और दीर्घकालिक परिणामों को देखना जरूरी है। इसलिए उनकी यात्रा का आकलन उपलब्धियों और सीमाओं, समर्थकों की दलीलों तथा आलोचकों के सवालों को संदर्भ सहित समझकर करना अधिक उपयोगी होगा।

विकसित भारत के संकल्प और संभावनाएं

नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के साथ ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बना है। आजादी के 100 वर्ष पूरे होने पर भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की परिकल्पना केवल आर्थिक आकार बढ़ाने की बात नहीं है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, मजबूत बुनियादी ढांचा, तकनीकी क्षमता, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन सभी जरूरी होंगे। भारत के पास युवा आबादी, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की ताकत है। लेकिन इतने बड़े और विविधता वाले देश में विकास की यात्रा आसान नहीं है। गांव और शहर, गरीब और मध्यम वर्ग, कृषि और उद्योग, परंपरा और आधुनिकता इन सबके बीच संतुलन बनाना होगा। यही वह मोड़ है जहां नरेंद्र मोदी की 75 वर्ष की जीवन-यात्रा और भारत के भविष्य की यात्रा एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है। अगले दो दशक केवल किसी एक नेता या सरकार की कहानी नहीं होंगे। वे पूरे देश की सामूहिक क्षमता, संस्थाओं की मजबूती और नागरिक भागीदारी की परीक्षा भी होंगे।

संघर्ष से नेतृत्व तक बदलते भारत की तस्‍वीर

75 वर्ष की उम्र में नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक यात्रा को एक वाक्य में समेटना आसान नहीं है। वडनगर से शुरू होकर गुजरात के प्रशासन, दिल्ली की सत्ता, विकास योजनाओं और वैश्विक कूटनीति तक पहुंची यह यात्रा संघर्ष, संगठन, राजनीति और शासन के अनेक अध्यायों से गुजरती है। इस दौरान कल्याणकारी योजनाओं को डिजिटल तकनीक से जोड़ने, आधारभूत ढांचे को गति देने, वित्तीय समावेशन बढ़ाने, महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने और किसानों तक प्रत्यक्ष सहायता पहुंचाने पर जोर रहा। पीएम-किसान की 17वीं किस्त में लगभग 9.26 करोड़ किसानों को 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का प्रत्यक्ष हस्तांतरण इसका एक उदाहरण है।

हालांकि किसी भी राजनीतिक दौर का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता। नीतियों के परिणाम समझने के लिए आंकड़ों के साथ लोगों के अनुभव और दीर्घकालिक प्रभावों को भी देखना जरूरी है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक असमानता, क्षेत्रीय संतुलन और अवसरों की व्यापकता जैसे प्रश्न इस मूल्यांकन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। एक साधारण परिवार से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने की यात्रा भारतीय लोकतंत्र की व्यापकता को दर्शाती है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यह भी है कि नीतियों से आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर हुआ और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा। नरेंद्र मोदी के 75 वर्ष इसलिए केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि बदलते भारत की यात्रा को समझने का अवसर भी हैं। आगे की चुनौती आर्थिक शक्ति को मानवीय विकास, तकनीकी क्षमता को रोजगार, सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक आत्मविश्वास और वैश्विक भूमिका को व्यापक जिम्मेदारी से जोड़ने की है।

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अंग भारत • रिपोर्टर

‘अंग भारत’ एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र है, जो मिलन ग्रुप द्वारा संचालित एक बहुआयामी मीडिया संगठन का हिस्सा है। हमारा कॉर्पोरेट कार्यालय बिहार के ऐतिहासिक अंग प्रदेश के पवित्र स्थान बांका में स्थित है। हमारा उद्देश्य निष्पक्ष, विश्वसनीय और जनहित से जुड़ी खबरों को पाठकों तक पहुंचाना है।”

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